एक इश्क ऐसा भी।

मेरे हर सफर में तुम मेरे साथ थे। तुम्हारा साथ रहना जैसे रोज़ की आदत हो चुकी थी। तुम इतने करीब थे कि कभी महसूस ही नहीं हुआ के तुम साथ हो। ऐसा नहीं कि मुझे तुम्हारी कदर नहीं या तुम्हे मेरी कदर नहीं, पर ये न तुमने कभी कहा और न मैंने कभी कहा।

एक दिन, यूँही साथ चलते चलते किसी आवारा पँछि से हमारी मुलाकात हो गयी। उसने पहली बार मुझे ये एहसास दिलाया कि मैं भी किसी की चाहत के काबिल हूँ। उसने मुझे बताया कि मुझसे भी कभी कोई मुहब्बत कर सकता है। मुझे वह अपने साथ आसमाँ तक उड़ा ले गया।

हम तुम तो हमेशा ही ज़मीन पर चले थे। ये नई उड़ान मुझे अच्छी लगने लगी। जब उसके जाने का समय आया, तो उसने मुझे तुम्हारे पास वापस छोड़ दिया। जाते जाते ये वादा कर गया की वह वापस आएगा।

मैं तुम्हारे साथ बैठ कर अपनी उस उड़ान की बातें करता और तुम, मिट्टी के माधो की तरह मुस्कुराते रहते। मुझे ये याद दिलाते रहते की वो मुझे लेने आएगा। मैं मन ही मन उसकी सुंदरता को याद कर सपनों में खोया रहता था।

एक दिन वह पँछि वापस आया। वो मुझे साथ उड़ा ले गया और तुम वहाँ खड़े मुझे जाता देखते रहे। जब मैंने पीछे मुड़ कर देखा तो तुम्हारी आँखें नम थीं। शायद तब मुझे भी ये एहसास हुआ कि मैं अपने साए से दूर जा रहा हूँ। तुम्हारे बिना एक कदम नहीं बढ़ा, आज तुम्हारे बिना ही दूर जा रहा हूँ।

ये मैंने पहले क्यों नहीं सोचा? मैं तुम्हारे बिना कैसे आगे बढूँगा? इस अजनबी को मैं नहीं जानता, लेकिन इसके साथ इतनी दूर चल पड़ा, पर अपने साए को पीछे ही छोड़ आया?

मैं वापस मुड़ कर आया ये बताने को कि तुम मेरे लिए क्या हो। तुमने मेरी आँखें पोछ कर मुझे समझाया कि अब मुझे नई ज़िन्दगी शुरू करनी है। मैं एक बार फिर भारी मन से अपने पँछि के साथ उड़ चला।

कुछ दिन बीते और समय के साथ वो पँछि भी बदलता गया। मुझे पता चला कि मैं उसके लिए एक कपड़े सा था, जिसे वो जब मन करे पहन सके और जब मन करे उतार दे। मैं हार कर वहाँ से चला आया। उसको मेरे होने न होने से अब वैसे भी फरक नहीं पड़ता।

जब मैं वापस आया तो पता चला तुमने किसी के साथ अपनी एक छोटी सी दुनिया बसा ली है। और उसने तुम्हे तब संभाला जब तुम मेरे बिना अकेले सारा दिन कोने में रोते रहते थे।

मैं इतना तो समझ गया हूँ कि कोई मेरी आँखों से, मेरे शरीर से, मेरे होठों से कितना भी प्यार कर ले, पर मुझसे कोई इतना प्यार नहीं कर सकता जितना तुमने किया है। शायद प्यार को ज़ुबाँ की ज़रूरत नहीं। शायद ज़रूरत है तो निगाहों को पढ़ पाने की हुनर की।

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