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चल तुझे नया जाहाँ दिखाऊँ

सुना है तितली के पँखों से
दूर कहीं तूफान उठा
सोचता हूँ कि मैं भी अपने
बंधन तोड़ कर पँख फैलाऊँ।

तुम्हारी अनकही बातों ने भी
बरबस ही मुझे रुलाया है
क्यों न तुम्हारी खामोशी में मैं
अपने पँखों से तूफान ले आऊँ।

बहुत कोशिशें की है तुमने
मेरा वजूद मिटाने की
आज इस तूफान से तेरे
घमण्ड का मैं वजूद मिटाऊँ।

आज मुझे ये इल्म हुआ है
बेमतलब है तेरा डरना मुझसे।
किताबों के उन पन्नों से आ
तुझको भी मैं रिहा कराऊँ।

भूल जा बस कुछ पल को
लिखा था जो उन किताबों में
चल तुझको मैं खुशियों के
नए नए कुछ रंग दिखाऊँ।

रोता होगा खुदा वो बैठा
देख के तेरी नफ़रत को
दिए हैं तुझको ज़ख्म जो उसने
चल उन पर भी मैं मलहम लगाऊँ।

रब मेरा वो देख रहा है
किसमें कितना बैर बसा
काट ले मेरे पँख भी ज़ालिम
फिर भी मैं अब रुक न पाऊँ।

गर खुदा की कदर है तुझको
छोड़ दे झूठी नफरत को
हाथ थाम, मैं खुशियों का
चल तुझे नया जाहाँ दिखाऊँ।

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